दिल्ली का मलबा: एक बड़ी समस्या या एक नया अवसर?

The Bharat Day


नई दिल्ली:
दिल्ली में हर रोज़ इतना कंस्ट्रक्शन का मलबा निकलता है कि उसे संभालना एक बड़ा सिरदर्द बन चुका है। लेकिन असली परेशानी मलबा इकट्ठा करने की नहीं बल्कि उसे दोबारा इस्तेमाल (re-use) करने की है। एक दशक पहले बनाए गए रीसाइक्लिंग नियमों के बावजूद, सरकारी एजेंसियां ​​टारगेट पूरा करने में बुरी तरह पिछड़ रही हैं।

​आंकड़े जो आंखें खोल देंगे

  • रोजाना का कचरा: दिल्ली में हर रोज लगभग 6,000 मीट्रिक टन (MT) कंस्ट्रक्शन और डिमोलिशन (C&D) वेस्ट निकलता है।
  • साल 2025-26 का टारगेट: सरकारी एजेंसियों को 9.9 लाख मीट्रिक टन रीसाइकिल्ड प्रोडक्ट्स इस्तेमाल करने का टारगेट दिया गया था।
  • असलियत: 1 अप्रैल 2025 से 28 फरवरी 2026 के बीच सिर्फ 1.3 लाख मीट्रिक टन (लगभग 13%) मलबा ही दोबारा इस्तेमाल हो पाया।

​कौन सी एजेंसी कहां खड़ी है?

​आवास और शहरी मामलों के मंत्रालय ने टारगेट्स को थोड़ा कम और व्यावहारिक भी बनाया था, फिर भी एजेंसियां ​​पीछे हैं:

  • MCD (दिल्ली नगर निगम): 2 लाख मीट्रिक टन के टारगेट के मुकाबले सिर्फ 26.7% (53,479 MT) इस्तेमाल किया।
  • DDA (दिल्ली विकास प्राधिकरण): 50,000 मीट्रिक टन के टारगेट में से सिर्फ 32.5% हासिल कर पाई।
  • PWD: सबसे खराब प्रदर्शन करने वालों में से एक रहा। 1 लाख मीट्रिक टन के टारगेट में से सिर्फ 2.2% (2,122 MT) ही उपयोग किया।
  • नॉर्दर्न रेलवे: 10,000 मीट्रिक टन का टारगेट मिला था लेकिन इस्तेमाल शून्य रहा।

​आखिर दोबारा इस्तेमाल क्यों नहीं हो पा रहा?

​मलबे को रीसायकल करके पेविंग टाइल्स, कर्बस्टोन और फिलिंग मटेरियल बनाया जा रहा है, लेकिन एजेंसियां ​​इसे लेने से कतरा रही हैं। इसके पीछे के मुख्य कारण हैं:

  1. क्वालिटी का डर: ठेकेदारों और सरकारी एजेंसियों को डर है कि रीसाइकिल्ड मटेरियल उतना मजबूत नहीं होगा। कभी-कभी जनता भी सड़क बनाने में इस मटेरियल के इस्तेमाल पर सवाल उठाती है।
  2. सीमित वैरायटी: हर तरह के निर्माण कार्य के लिए जरूरी प्रोडक्ट्स इन रीसाइक्लिंग प्लांट्स में नहीं बनते।
  3. बड़े प्रोजेक्ट्स की कमी: अधिकारियों का कहना है कि जब तक कोई बड़ा इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट शुरू नहीं होता, तब तक इतनी बड़ी मात्रा में इस मटेरियल की खपत संभव नहीं है।

​दिल्ली के 5 बड़े रीसाइक्लिंग प्लांट्स

​दिल्ली के कचरे को रीसायकल करने के लिए फिलहाल 4 बड़े प्लांट्स काम कर रहे हैं और 5वां बन रहा है:

  • बुरारी (क्षमता: 2,000 मीट्रिक टन)
  • बक्करवाला (क्षमता: 1,000 मीट्रिक टन)
  • रानीखेड़ा (क्षमता: 1,000 मीट्रिक टन)
  • शास्त्री पार्क (क्षमता: 1,000 मीट्रिक टन)
  • तेहखंड (1,000 मीट्रिक टन क्षमता का प्लांट अभी बन रहा है)

​विशेषज्ञों का क्या कहना है?

​हालांकि प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) और केंद्रीय मंत्रालय ने इस पूरे सिस्टम की निगरानी शुरू कर दी है और हाल ही में 15 दिनों के अंदर 1 लाख मीट्रिक टन मलबा हटाने का टारगेट भी रखा गया था, लेकिन एक्सपर्ट्स का कहना है कि सिर्फ कचरा इकट्ठा करके ढेर लगाने से कोई फायदा नहीं होगा। जब तक उसे दोबारा कंस्ट्रक्शन में इस्तेमाल नहीं किया जाएगा, तब तक दिल्ली की मलबे की उलझन खत्म नहीं होगी।





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