तेल रिसाव से शुरू हुई पहल
पृथ्वी दिवस की नींव अमेरिकी सीनेटर गेलॉर्ड नेल्सन ने रखी थी। 1969 में सांता बारबरा, कैलिफोर्निया में हुए भीषण तेल रिसाव ने उन्हें गहराई से झकझोर दिया। इसके बाद उन्होंने पर्यावरण के प्रति जागरूकता बढ़ाने के लिए इस दिन की शुरुआत की। 1970 से शुरू हुआ यह अभियान 1990 तक वैश्विक स्तर पर फैल गया और तब से यह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मनाया जाने लगा है।
22 अप्रैल की खास वजह
इस दिन का चयन सोच-समझकर किया गया था। सीनेटर नेल्सन चाहते थे कि ज्यादा से ज्यादा छात्र इसमें भाग लें। 19 से 25 अप्रैल के बीच का समय कॉलेजों में उपयुक्त माना गया, क्योंकि इस दौरान न तो परीक्षाएं होती हैं और न ही प्रमुख छुट्टियां। इसी वजह से 22 अप्रैल को पृथ्वी दिवस के रूप में तय किया गया।
ग्लोबल वार्मिंग: सबसे बड़ा खतरा
दशकों से पृथ्वी दिवस मनाने के बावजूद पर्यावरण संकट अब भी गंभीर बना हुआ है। खासतौर पर ग्लोबल वार्मिंग आज दुनिया के सामने सबसे बड़ी चुनौती है। ग्रीनहाउस गैसों में बढ़ोतरी के कारण धरती का तापमान लगातार बढ़ रहा है, जो भविष्य के लिए खतरनाक संकेत है।
संदेश: सिर्फ पौधारोपण नहीं, सोच में बदलाव जरूरी
पृथ्वी दिवस हमें चेतावनी देता है कि अगर हमने अपनी आदतों में बदलाव नहीं किया, तो आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित भविष्य खतरे में पड़ सकता है। इस दिन का असली संदेश सिर्फ पेड़ लगाना नहीं, बल्कि प्रदूषण को कम करने और पर्यावरण के संरक्षण के लिए ठोस कदम उठाना है।

